देश

खाने के पैकेट पर ‘लाल न‍िशान’ से फूड इंडस्‍ट्री हलकान, सरकार से सीधे भ‍िड़ने को तैयार

अगर आने वाले दिनों में बिस्कुट, सॉस, अचार, नमकीन या दूसरे पैकेज्ड फूड के पैकेट पर बड़ा लाल निशान दिखाई दे तो हैरान मत होइए. सरकार खाद्य पदार्थों के पैकेट के सामने ऐसा चेतावनी लेबल लगाने की तैयारी कर रही है, जिससे ग्राहक को तुरंत पता चल सके कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट ज्यादा है. लेकिन सरकार की इस योजना ने देश के 100 अरब से ज्यादा के पैकेज्ड-फूड उद्योग और सरकार को आमने-सामने ला दिया है. उद्योग संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा है कि इन नियमों को लागू करने से पहले इनके वैज्ञानिक आधार और भारतीय खान-पान की आदतों को ठीक से देखा जाना चाहिए.
क्या है सरकार का प्रस्ताव?
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने 28 अगस्त को पैकेज्ड फूड के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का प्रस्ताव रखा था. इसके तहत ऐसे उत्पादों पर लाल रंग का हेक्सागोनल चेतावनी चिन्ह लगाने की बात है, जिनमें तय सीमा से ज्यादा मात्रा में कम से कम दो चीजें एडेड शुगर, नमक या सैचुरेटेड फैट मौजूद हों. यानी ग्राहक को पूरा पैकेट पढ़ने के बजाय सामने ही एक नजर में संकेत मिल सकेगा कि उत्पाद में इन पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा हैं

फूड कंपनियों को सबसे ज्यादा आपत्ति किस बात पर?
ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन यानी AIFPA ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में कहा कि इन सीमाओं की और वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए. संगठन का कहना है कि नियम बनाते समय भारतीय खान-पान और लोगों के उपभोग के पैटर्न को ध्यान में रखना जरूरी है. उद्योग की चिंता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि AIFPA के पिछले नियामकीय पक्ष के मुताबिक भारत में करीब 80 फीसदी पैकेज्ड-फूड उत्पाद प्रस्तावित व्यवस्था के तहत हाई फैट, शुगर या सॉल्ट श्रेणी में आ सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो मामला सिर्फ कुछ जंक फूड तक सीमित नहीं रहेगा. रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई पैकेज्ड उत्पाद भी लाल चेतावनी के दायरे में आ सकते हैं.
100 ग्राम वाला नियम क्यों बना बड़ा मुद्दा?
100 ग्राम का पैरामीटर सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. उद्योग के कुछ अधिकारियों ने रॉयटर्स से कहा कि किसी उत्पाद को 100 ग्राम के आधार पर जांचना वास्तविक खपत को सही तरीके से नहीं द‍िखाता. मसलन, कोई व्यक्ति एक बार में 100 ग्राम अचार या केचप नहीं खाता. ऐसे में उद्योग चाहता है कि उत्पाद में पोषक तत्वों की मात्रा तय करते समय एक सामान्य सर्विंग को भी आधार बनाया जाए. AIFPA ने अपनी दलील में अमेरिका के प्रस्तावित मॉडल का उदाहरण देते हुए भारत में भी प्रति सर्विंग के आधार पर गणना पर विचार करने की मांग की है.
चीनी और फैट की सीमा भी सख्त बताई जा रही
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक उद्योग से जुड़े अधिकारियों को खास चिंता इस बात की है कि भारत में प्रस्तावित सीमा कई दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा सख्त हो सकती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि ठोस उत्पादों में एडेड शुगर 3 फीसदी से ज्यादा और फैट 4.2 फीसदी से ज्यादा होने जैसी सीमाएं उद्योग के लिए चिंता का विषय हैं. फूड इंडस्ट्री का तर्क है कि इतने सख्त मानक लागू करने से कई सामान्य उत्पाद भी चेतावनी लेबल की श्रेणी में पहुंच सकते हैं.

कौन-कौन सी बड़ी कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं?
AIFPA के सदस्यों में Nestlé, Coca-Cola, PepsiCo और Hindustan Unilever जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. यानी यह लड़ाई सिर्फ छोटे खाद्य निर्माताओं की नहीं है, बल्कि भारत में कारोबार करने वाली बड़ी घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. दूसरी तरफ, Nutrition Advocacy in Public Interest के डॉ. अरुण गुप्ता ने उद्योग की दलीलों को चेतावनी लेबल को टालने की कोशिश बताया है.

अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली सुनवाई
भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर पहले से ही सख्ती बढ़ रही है. देशभर में खाने-पीने की दुकानों और प्रतिष्ठानों पर जांच और छापेमारी का दौर चल रहा है. इसी माहौल में पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का प्रस्ताव सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई करने वाला है